बरस नयो-अंगरेजी आयो, नहीं भेंट कुछ नूतन ल्यायो

छै-रो अंक सदा-ज्यूं पूठो, पूठो ही रह भाग्य नसायो

नहीं मान्यता मिली आज भी, ओज्यूं पांसळियां करणाई

फेर निराशा साल-सवाई!

राजस्थळी आठ-बीसी है, सात-बीस बिणजारो पूग्यो

बरस सात रो देस-दिसावर, और आठवों ओळख छूग्यो

जोत-जागती चौतीस बरसी, कागदजी री पीड़ लिखाई

फेर निराशा साल-सवाई!

कलकत्तै-वाळो सम्मेलन, ठेठ हैदराबाद हांडियो

देव कोठारी के-के करता, फिरै प्रशंसा-पत्र मांडियो

गरुड़ पुराण पाण्डियो बांचै, वैतरणी री पार पाई

फेर निराशा साल-सवाई!

कल्चर रा सम्पादक पूछै, भाषा-हेतु प्राण कुण त्यागै

कुण बांकड़ली मूंछांवाळो, लड़ै हरावळ माथा भांगै

ऑफिस-नीचै दब्या पड़्या है, मोटो वेतन चाट मळाई

फेर निराशा साल-सवाई!

अकादम्यां नैं भंग करावो, छोड़ नौकरी बाहर आवो

कंस-राज नैं पटक-पछाड़ो, ग्वाळ-बाळ संग कृष्ण पठावो

पांच-टेम रा भूखा राघव, समंद पार जा लंका ढाई

फेर निराशा साल-सवाई!

भर्‌यै-पेट रा राजस्थानी, सेठाई में नाम कमायो

और कमाई सूझै कोनी, बेसी धन स्यूं मन भरमायो

भाषा-बिना जाति उठ ज्यासी, इसड़ी कोनी करै पढ़ाई

फेर निराशा साल-सवाई!

मैथिली वाळां नैं भी देखो, लेय मान्यता नाचै-गावै

अेक बरस स्यूं बेसी होगो, बच्चो-बच्चो हरख मनावै

उणरै सांमै मारवाड़ी री, मोटी-स्यूं मोटी हळकाई

फेर निराशा साल-सवाई!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : अम्बू शर्मा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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