जग जाणै–

थोड़ा दिनां पैली हा

हाकम धाड़ेती,

वोट लेवणिया धाड़ेती!

गरीब रो राम धाड़ेती लागै है।

समाजवाद जाय पूगो–

सात संमदां पार।

कुण जाणै,

इण कंकाल रा भाल माथै

पच्चीस में पचास री रेखा बणसी,

पण सही जाणजै–

इण बेळा च्यारूं मेरां

रूपाळी अन्तोदय बादळी–

आडावळ माथै चढ़ घरणाई है।

कुण जाणै,

किण बगत–

गरीब री टापरी में हेलो पाड़तो

समाजवाद

पावणो जावै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : दूदसिंह काठात ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अगस्त, अंक 06
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