देख्यौ छै

थानै परबत कदी

रोतो हुयो,

रोवै परबत,

तो रोवाण छै

औरां तांईं,

ईं सार हिं

बण ग्यौ ठूंठ,

रह छै सारा पहर ही

अणमणो, चढ़चढ़ौ

ऊंको काळजौ

होग्यो छाठो, भाटां सूं भी ज्यादा

बच्यारी बरफ

माथो फोड़-फोड़

हारगी ऊं सूं

जब खीज को पाणी

ऊं का माथा पै सूं

कट जावैगो,

आकास सूं गरक

मरबा को करगो ऊं कौसिस,

सुणी थांनै

अब तो

मिनख भी

बणग्यो परवत।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कृष्णा कुमारी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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