कठै गई बै दूध री नदियां

कठै गया घी रा नाळा

चेतो कर थूं छोड़ ऊंघणो

धरती रा रखवाळा!

थांरी सोवण री बेळा में

मां पर जुलम हुया भारी

भुजा काट ली दूध सुकायो

अब माथै री तैयारी

हिंदवाणी सूरज ढकणै

नेता बणर्‌या बादळ काळा

चेतो कर थूं छोड़ ऊंघणो

धरती रा रखवाळा।

छाती ऊपर मूंगदळै है सालां स्यूं

भाई-भाई में राड़ करावै

बंदूकां हथियारां स्यूं

बैर्‌यां नै थे सबक सिखाओ

लगावो अेकता रा नारा

चेतो कर थूं छोड़ ऊंघणो

धरती रा रखवाळा।

जात-पंथ री बातां सूं थे

मन रै प्रेम नै पाड़ो ना

भासा अर प्रांतां रै भरम री

मन में घुंडी घालो ना

घड़ो ‘फूट’ रो फोड़ बढ़ो थे

भारत मां रा प्यारा

चेतो कर थूं छोड़ ऊंघणो

धरती रा रखवाळा!

धरती रा रखवाळा!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शिवराज भारतीय ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
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