कुण जाणै कै..!

टाबरां नै

इस्कूल भेजणै री तय्यारी बी

किणी महाभारत सूं

कम कोनी होवै,

अैन सवेरै

जद वै मीठी नींद में सूता होवै

स्यात सुपणा में

परिलोक री सैर कर रैया होवै

उणा नै जगा’र

ठेल देणा होवै है

बाथरूम में,

ऊंघता-ऊंघता वै

निवरत होवै नित करम सूं

फेर ‘ब्रश’ करणै री ताकीद

हंपड़ावा रो क्रम

यूनीफारम, जूता-मौजा

पाणी री बोतल, खाणा रो डाबो,

अर बस्तो,

आधुनिक होवण रो

अभिशाप ढोवै है

‘मम्मी’, ‘मामा’ कै ‘मॉम’

सभ्य होवण रै बोझ हेठैै

दब जावै है टाबर

अंकुरित व्हतो अेक नानो बिरछ।

रिक्शा में बेवाड़ता-बेवाड़ता बी

मॉम सोचै है

हाय कांई भूल तो नी गी

फेर ‘बाय मम्मी’ सुण’र

फूली नीं समावै है,

‘बाय बण्टी कै’र

हाथ हिलावै है,

इण गरब में बिसरा देवे है

सैंग थकान

पण उणनै खबर कोनी कै

वा ‘निरमाण’ नूत री है

कै ‘विनाश’ बोय री है?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भागीरथ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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