खेल भलेरा खेल, पण करता वणजै मती।
खासी तान न मेळ, सुभ धारनै बीसर्या॥
हरि जद राखै हाथ, जग निंवकर नैड़ो भिड़ै।
क्यूं न जतन रै साथ, मूळ न सींचै मूढ़ नर॥
किणनै कैवां रोय, कुण गरीब रा दुख दळै।
परम पिता बिन कोय, नीर न पूछै नैण रो॥
सीखो हूंदर लाख, विद्यापण सीखो घणी।
बिन हरि तूठां साख, जर जमै नहीं जगत में॥
मोथै ज्यूं भटकत फिर्यो, मोथा मुड़दा बीच।
मोती हाय अमोलको, पाय मिळायो कीच॥
जोर जुलम जगजाळ, जळम गुमायो जड़मिनख।
जत पहि जा दयाल, जोड़ी नहीं रीतो चल्यो॥
इमरत भरियो हौज, पण गैलो जाणै नहीं।
गैलो लेवै मौज बीजा, तो झुर झुर मरै॥
देखा देखी लोग, सांग भरै गैलै तणो।
साचो पूगण जोग, कपटी नै गोता मिळै॥
ओ प्यारा तरसूं खड़ो, वैगो मद दे ढाळ।
प्यालै पर प्यालो चढ़ै, उबरूं जग जंजाळ॥
बिना नशै सगती सिथळ, मनड़ो गोता खाय।
बोल्यां जग वहक्यो कहै, जीवण सूनो हाय॥
सांवळियै रै रूप रस, मन जद रींझै जाय।
कलम लिख्या मोती झरै, भूप हाथ फैलाय॥
हरि हिवड़ो हिल जाय, कूकै जद कुरणा भर्यो।
लेवै सुध झट आय, दीन दुखी रा दुख दळै॥
जिलम पाय जगतपति, जमा जरा न जोड़ी मीत।
जरा, जरा में जतन कर, अब तो वाजी जीत॥
गुण गातां नैणा झरै, गळो गळ-गळ होय।
सोई साचो भगत जन, काम, दंभ मद खोय॥
तन-मन तो रस सूं भर्यो, भगती भीनी वास।
नैणा झलकै सांवरो, उण चरणा रो दास॥