नारी थे नर री जणणी हो पण थांरो आदर कोनी

थे घर री धणियाणी हो पण थांरो कोई घर कोनी

जोबन में बालम रै घर रोवो बाबल रै बाळापन में

होय डोकरी करो नौकरी बेटां हन्दै आंगण में

थांरै जिसो दुनी में दूजो कोई भी बेघर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पर थांरो आदर कोनी

सगळी सिष्टी मांय त्याग मातर परम धरम थांरो

हुवै सुभाव समरपण सांचो सोवाभाव करम थांरो

सगळां सारु मर-मिटणै में थांरै मन में डर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पर थांरो आदर कोनी

सांतू काम सुंवारो हो थे पण जे चूक चिनी होवै

तो थांरो बावळियो बालम रीस भर्‌यो सुध-बुध खोवै

गाळ्यां में ही कोनी सारै, मारै के ठोकर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो, पर थांरो आदर कोनी

हाथ-पांव नी चालै जद भी सगळां री चिन्त्यां राखो

मार्‌यो जाय माजणूं बर-बर सेवा रो फळ चाखो

घणो लाड करतां भी थांरी बात सुणै टाबर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पण थारो आदर कोनी

थांरो जिण घर जलम हुवै उण रो तो मतै भाग फूटै

बाप दायजै रै डर सूं दिन-रात मूंड-छाती कूटै

च्यारुमेर भटकतां मिलसी थांरै सारू बर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पर थांरो आदर कोनी।

काळै बळद जियां थे घर मैं आखै दिवस हाड पैळौ

हेलो जे नी सुण पावो तो सगळो खोट होय भेळौ

आख्यां देख धणी री, डर सूं धूजो के थर-थर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पर थांरो आदर कोनी

धरती मां री जियां आपणै आयोड़ां री चूक सैवो

मारकूट भी झेलो सुख सूं, मुख सूं क्यूं भी नहीं कैवो

दुख रै मांय भूख री मारी हांडो के दर-दर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पण थांरो आदर कोनी

ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी तुळसी ताड़ण जोग कैयी

होय नराज समाज आज रो उण नै गाळी घणी देयी

पण बळती दायजै बिना यूं देखां के घर-घर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पण थांरो आदर कोनी

थाळी बाजै छोरो जलम्या धी जाया सगळा कूकै

बेरो पड़तां पाण मारणै सूं भी बोळा नींं चूकै

देख दशा नारी री धूजै के धरती-अम्बर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पण थारो आदर कोनी

सूधा इक्कीसवीं सदी में आज लोग पगल्यां मेलै

परदेशी तो चांदलोक में जा गुल्ली-डंडा खेलै

पण म्हे तो बारवीं सदी सूं सरक्या तिल-मातर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पण थांरो आदर कोनी

कोई अपणो नाव करण नै महिला दिवस मनावै है

कोई थारै नाव आसरै जागृति-जोत जगावै है

पण थांरी काणी में स्याणी अब ताणी अन्तर कोनी

नारी थे नर री जणणी हो पण थांरो आदर कोनी

रेल, बसां में, गळी-गळी में गुण्डा थांरै गैल हुवै

थे तो भोळा-भाळा हो पण उण रै मन में मैल हुवै

थाणैं जा'र पुकारो चायै क्यूं भी होय असर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पर थांरो आदर कोनी

कोई थां सूं राय पूछै काम करो बणकर बांनी

छोटी-छोटी बातां नैं भी राखै स्सै थां सूं छानी

गांव-गुवाड़ी-गळियां में भी थांरी कठै कदर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पर थांरो आदर कोनी

थे राणी राधा-रुकमण हो लिछमी, सुरसत हो सीता

थे तो सगती रा प्रतीक हो अब किण बिध होया रीता

अत्याचारी रो विनास थे कीन्यो के बर-बर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पर थांरो आदर कोनी

बणो अब घर री लिछमी थे बण ज्यावो दुरगा काळी

अन्यायी री रकत धार सूं भर ल्यो खप्पर कंकाळी

देखा थांरी पूजा फेरूं करसी कुणसो नर कोनी

नारी, थे नर री जणणी हो पण थांरो आदर कोनी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : महावीर प्रसाद जोशी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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