उपगुप्त जवान सरुप सन्त

भगवान बुद्ध को चेलो छो।

मथुरा का परकोटा कन्नै,

धरत्यां सूतो अलबेलो छो।

बस्ती का सारा दीया नंद,

जुड़ ग्या गुवाड़्यां का किंवाड़।

आमर का तारा भी लुकगा,

सावणी घटा की ले’र आड़।

जद ही कोई का कौंळा पग,

गैणां-गांठां सैं सज्या-धज्या।

साधू की छाती सै भिंटगा,

झट-झटका सैं रमझोळ बज्या।

लीला-पीळा लत्ता पैर्‌यां,

वा नाचण नार नवेली छी।

जोबन को भार लद्‌यां तन पै,

रति की उणियार अकेली छी।

रतनां का जगमगाहट सैं जद,

ऊं साधू की काया चमकी।

वा चौंक’र नीची झांकी तो,

पलकां पर मणां बरफ जमगी।

वा दिवला नै नीचो लळा’र,

जद निरखी सोभा साफ-साफ।

तो पगां पड़’र अरदास करी–

म्हातमा, करो अपराध माफ।

मुखड़ा की मुदरा गैरी छी,

अर रूप-सरुप लुभाणू छौ।

डील में उपणता जोबन पै,

प्यासा मन नै मंडराणू छो।

बोली-किरपा कर घर चालो,

या धरती थां लायक कोनै।

आपकै बिना मूनै जग में,

पड़ पासी पल भी जक कोनै।

साधू बोल्यो कै चली जा तूं,

अब अण्डै ऊभी रै मत नै।

ओसर आयां सै में खुद ही,

पौंचूंलो थारै कन्नै।

चुभ गई काळजै नाचण कै,

ऊं साधू की या कड़ी बात।

बिजळी-सी कड़की आमर में,

गी चली दांत दमका’र रात।

लळ गई लद’र फळ फूलां सैं,

पथ का पेड़ां की डाळ-डाळ।

बंसी का मधुरा सुर बहा’र,

ल्या री बसन्त की मस्त भाळ।

उच्छब आनन्द मनाबा नै,

बागां में लोग चल्या आया।

लीलामर सैं चन्दो निरखी,

ऊं नगरी की निरजन काया।

पण, सन्यासी की छाया-सी,

सूनै पथ सरक्यां जा री छी।

आम की डाळ माळै कोयल,

पीड़ा का गीत सुणा री छी।

उपगुप्त नगर सैं निकळ, हुयो,

परकोटां कै सारै ऊबो।

ऊं नै सिसक्यां सुण-सुण’र हुयो

दुखियारी नारी को सूबो।

वो निजर पसार’र देखी तो,

नारी की काया तड़पै छी।

रूं-रूं सैं पीप चू रैह्यो छो,

तो भी जीबा की अड़पै छी।

छूत का रोग सैं बचबा नै,

नागरिक नगर सैं ताड़ गया।

रंग-रूप’र जोबन जातां ईं,

जग का सैं प्यार’र लाड़ गया।

या देख’र साधू बैठ गयो,

गोदी में ऊंको सीस ले’र।

सूख्योड़ा कंठ कर्‌या आला,

सीळा पाणी की बूंद गेर।

जद चैन मिल्यो अर चेत हुयो,

तो देख्यो नाचण खोल नैण।

पण रूप पिछाण पाई तो

मूंडा सै निकळ्या करुण बैण–

हे दया निधान, आप कुण छो?

क्यूं इतरो कष्ट उठावो छो?

कंचन-सी कोंळी काया कै,

क्यूं म्हारा कोढ़ लगावो छो?

साधू बोल्यो– नींकां पिछाण,

आखर आई गो वो ओसर।

में बचनां बांध्यो हुयो आ’र

हूं थारी सेवा में हाजर।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : रबीन्द्रनाथ टैगोर ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : सितम्बर, अंक 07
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