फिरो क्यूं चितबंगा ठौड़-ठौड़

अब लो ध्यान अेकण कानी मोड़

राष्ट्रभाषा है सिर-मौड़ पण

कोन्यां मात-भासा री जोड़।

खींचा-ताणी रै इण जमानै

लागी जिण में होडा-होड

भोळा! थांनै लागै क्यूं नीं

फेरूं सूं चेतन रो कोड।

किण खूंटां सूं बंध्या थे

इतरी लांबी जिण री डोर

भूल रैया हां म्हे तो खुदनै

आपां में मोटी खोड़।

हिरदै रो हरियो रंग जिण में

जलमभोम री उठै हिलोर

झुर-झुर होय रही बदरंगी

मा भासा काळजियै कोर।

भूल्या भटक्या भळै फिरोला

जे बेगा नहीं चेतोला

कद देखांला बो दिनड़ो जद

सगळा इण सूं हेत करोला।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : विक्रमसिंह गुन्दोज ,
  • संपादक : माणक तिवारी ‘बंधु’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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