मन री बातां कुण नै कैवै।

जीव घणोई उणमणो रैवै॥

दिन ऊगै दिन बगै आथमै।

नींद उचटज्या स्याह रात में।

जंजाळां री कड़ी जुड़ै नीं।

धुंधळी सूरत खप्पर हाथ में।

कुण अर्‌‌थावै आं सपनां नै।

नैण खुलै आँसू बह्वै॥

मन री बातां कुण नै कैवै।

जीव घणोई उणमणो रैवै॥

कुण पूछै बातां हिवड़ै री।

सै नै फिकर निजू जिवड़ै री।

बात सुहावै नहीं किणी नै।

हुई तपस्या फैल बडै री।

आंख्यां, कान बंद कर बुढउ।

हिम्मत कर सगळा सहवै।

मन री बातां कुण नै कैवै।

जीव घणोई उणमणो रैवै॥

करै अरज हे राम उठालै।

घर का माणस इब दिन घालै।

खूणै पड़्यौ घर रै पिछवाड़ै।

सबद बाण घरकां रा सालै।

किस्मत सूं दिन माड़ा आया।

दोस और नै क्यूं देवै।

मन री बातां कुण नै कैवै।

जीव घणोई उणमणो रैवै॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शंकरलाल स्वामी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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