छिपकली!

अे छिपकली!!

ईं मिनख सूं

तूं ही भली

ईं भीत री

ईं छात री

कीं पाण तो राखै है तूं

ईं ठोड़ री

बीं ठोड़ री

कीं लाज तो राखै है तूं

भटकै तो नीं तूं

मिनख दाईं

ईं गळी अर बीं गळी।

कीं भख्ख री

अण भख्ख री

पीछाण तो थारै हुवै

अे ठीक री

बे ठीक री

कीं काण तो थारै हुवै।

मानै तो नीं तूं

मिनख दांई

अेक कर, भूंडी भळी।

है जात रो

बे बात रो

तूं रगत कद पीवै बता?

तूं बंस नै

निज अंस नै

कर घात कद जीवै बता?

कद मिनख दांई

आपरी–

तूं आप ही नासै कुळी।

धरम रा

दीन रा

तूं छिपकली झगड़ा करै

भेख रा

भायखा रा

ही कद रगड़ा करै।

सबळी हुयां तूं

कणाई जात नै रोसै नईं

अेक नै दूजी

कणांई स्वारथ सूं सोसै नई

पनपै नईं

आपोपरी में

थामै इरखा सूगली।

छिपकली!

अे छिपकली!!

ईं मिनख सूं तूं ही भली!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मोहन आलोक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 14
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