जिणांरो विनोद मोह देवै
मन हर लेवै
जको सन्तान निज
कुल उजवाळै है।
हंस-हंस नै रस रो
लुटावै है खजानो निन्त
कस कर काम
निज परिवार पालों है।
सास-ससुरा री
सेवा करै है हरख-कोड़
सेवा नै समझ सार
ऊमर नैं गाळै है।
हाय! हाय! हाय! लोभ,
थारो न कोई थोभ
दायजा री लाय मांय
नारियां नै बाळै है।
प्यारी-प्यारी नार
भरतार-भव सार करै
जग कारागार नै
बणावै रसदार है।
नेह सूं सनेह दीठ
देख चानणो जो करै
जीत ई जिणारै बिना
लागै ज्यूं हार है।
नित-नित नवलो है
जिणरो सरूप रूप
रात खुद करै काळा
केसां रो सिणगार है।
जिको इण असार
संसार में है सार रूप
इसी देवियां रा क्यूं
हत्यारा भरतार है?
जठै नहीं गुण री कदर
न परख कुल री
सिड़्योड़ै सूत फूल
पोय रहो बाप है।
लिछमी जिसी सुता नै
बांध गेलियां रै गळै।
कामना री नाव नै
डूबोय रह्यो बाप है।
खबर मरण री सुण
पछता-पछता-पछता
आंसूवां सूं आंखियां नै
धोय रह्यो बाप है।
हाय-हाय बेटी!
किण पाप रो प्रताप-साप
माथो घूण-घूण धाप
रोय रह्यो बाप है।
लिछमी सरस्वती नै
महाकाली रूप मान
पूजां उण नार नै
लुटवाय रह्यो दायजो
रूप प्रतिभा नै ऊंचै
कुल नै सुघड़ता री।
मणियां रमणियां
मरवाय रह्यो दायजो।
लोभ रा बंध्योड़ा नख
त्रिस्णां सूं भर्यो चख
कसम सै राखसी
करवाय रह्यो दायजो।
घणै लाड-कोड-हेज
हेत जतनां सूं पळी
बेटियां रसोई में
बळवाय रह्यो दायजो।