जद समै री गति थम जावै,

वो छिण, अस्थिरता रौ

बोझ त्याग’र

शून्य में विलीन व्है जावै।

उण वगत मिरत्यू आवै

पण मिरत्यू अंत कोनी,

अेक मौन प्रवेशिका है—

जिणमें प्राण प्रवेस करै

अठै जीवण रौ कोलाहल

संगीत बण’र

अणसुण्या लोक में जाय’र गूंजै।

मिरत्यू थाक्योड़ा प्राणां री बिसांई है।

ज्यूं झरतोड़ा बीज

धरती री गै’राई में जाय’र

नवा विरछ बण जावै।

मिरत्यू—

अंधकार कोनी,

अंधकार में छुप्योड़ौ

अणंत जोत रौ अंस अर

उजाळै रौ बीज है।

स्रोत
  • पोथी : कऊ री झाळ ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
जुड़्योड़ा विसै