म्हारो दरद

तू नी जाणसी

दरद

घणो ऊंडो है

पैली थारै

मनड़ै मांय झांक

तू जाण जासी

दरद कस्योक होवै है।

थारी अनुभूति सागै

मैं कितराक दिनां तांई जीवूं

अबै फेरूं सूं

रात होसी

अर दरद रो ऊफाण

इतरो उठसी

जीं री

अभिव्यक्ति कदै नी होवै।

लारला कितरा दिनां सूं

मैं अन्तस मांय

दरद रो डूंगर लिया फिरूं हूं

पण तूं नी आयो

अर थारी याद में

फेरूं सूं दरद निपज्यो है।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : चन्द्रकान्ता शर्मा ,
  • संपादक : दीनदयाल औझा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : मार्च, अंक 13
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