म्हांरौ अेक नान्हो-सो गांव

उणरौ ओळमौ थांरै नांव

जिणरै आंगण आज

आजादी रै सुपनै री जागा

सुळग रैयी है भूख

म्हां सुणी ही—

विकास गांव तांई पूंचैलौ

पण इण झूठै विस्वास माथै

मवेसी रुळग्या...

जमी नापण वाळा थां

वा लंब नापौ

जो मरै भूखां मवेसी

बिलखता टाबर

अर...

राजधानी री कुरसी बीच

यूं बात खुलगी है

फागण रै गीतां री जागां

आज सिंझ्या री बेळा में

भूखा मोर कुरळावै

सूखा बागां में

मटमैला घरां में

नव नवेलियां री हिचक्यां उभरै

दखणाऊ री हवा

उड़ाय ले जा रैयी है

बुझ्योड़ै चूल्है री राख

म्हांरै गांव में हिळगी है

स्हैरां रा उजियाळां सूं निकळ’र

गांव रा अंधियारा में झांकौ

नमायतौ सो गांव

जिणरी बस्ती टूट रैयी है

जिणरी तस्वीर डूब रैयी है

इणनै देखौ...

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : बस्तीमल सोलंकी ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : जुलाई 1986
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