आवो कविराजा बठै जठै बिछोही नार

दो आंसूड़ा जड़ घड़ै सौ छंदां की डार

सौ छंदां की डार’क डिंगळ घड़्यो जावै

लिखग्या स्याणा लोग’क कवि जन्म्योड़ा आवै

कह राजिन की नार सीखणो कविता चावो

तो अेकरस्यां मारवाड़ में भू बण आवो

माटी में कविता लिखै मारवाड़ की भूय

पाती में विपता भखै धण झूळस्योड़ी लूय

धण झूळस्योड़ी लूय’क रोट्यां में भी ठोसा

सासू सुरसा बणी धणीजी काळै कोसां

कह राजिन की नार जूण जा कैयां काटी

साठी में सासू काठी में भू की माटी

रात्यूं बोर्‌यां गेहूं दळै दिन में पोवै जेट

जेठ साढ़ कै तावड़ा अैं पाक्योड़ै पेट

अैं पाक्योड़ै पेट मिन्ट की चैन पावै

और भूवां छै-सात चैन की बीण बजावै

कह रजिन की नार बार चढ आया सात्यूं

सासू रोई छोरी होई सुण कर रात्यूं

होळी हरखां की थळी और दिवाळी भोग

लोग मनावै चाव सैं म्हारै आवै सोग

म्हारै आवै सोग तिंवारी खारी बरसै

फरसै का सा वार मारै राजिन डर सैं

कह राजिन की नार पूंछ भूवां की रोळी

सास खास बेटा मंगळा कर ध्यावै होळी

बिना बात की राड़ मरवण का कर माजणा

आडी बाड़ गुवाड़ सास खिंचावै सतवती

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : अंबू शर्मा ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर ,
  • संस्करण : 11, नवम्बर
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