तपत मोकळी पड़ती।

धरती घणी घणी तपती।

अे ताती चालै लूवां।

सूक रैयो है नीर कुवां।

सै तेज तावड़ो टाळै।

छीयां ठंडी अडवाळै।

सै जीव हो रैया व्याकळ।

मरु भूम उडीकै बादळ।

बंगाले माची बमछळ।

आसाम कियो तूं जळ जळ।

भ्यार उड़ीसो व्रिपतायो।

यू.पी. पंजाब सिधायो।

दिक्खण में राजी वरसै।

मरु भूम अेकली तरसै।

उरनै भी बरसादे जळ।

मरु भूम उडीकै बादळ।

धोरा हो रैया तिसाया।

तिस्या बण बणी मुंह बाया।

ईब मीं ईब मीं ज्यावै।

आस लगाये रैवै।

क्यूं ईयां घणो तरसावै।

क्यूंनीं प्यास बुझावै।

हुळसादे क्यूंनी मरुथळ।

मरु भूम उडीकै बादळ।

स्रोत
  • पोथी : अेक बीसी ,
  • सिरजक : भौमराज भंवीरू ‘मंगल’ ,
  • प्रकाशक : साहित्य मन्दिर राजगढ़ (बीकानेर)
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