म्हे हां म्हारै अस्तित्व रा अकाट्य तर्क
हां म्हे म्हारी अधिचेतना रो मनोविज्ञान
सृष्टि साथै जीवां म्हे अर ब्रह्माण्डीय चेतना रा गूंजै नाद
नीं म्हे लघु अर नीं म्हे क्षण
त्रिकाल री परिधि में नमै म्हारी दृष्टि
अर सृष्टि विस्तार रा म्हे प्रतिबिम्ब
मिनख री पिछाण होवै शाश्वत मानव धर्म
खण्ड खण्ड जोवेणै में कढै पूर्ण भाव
टूटग्या युग री आंधी में म्हारा प्रतिमान
पीग्या हां म्हे जग रो अणूतो विष
देख्यो है विकृत्यां रो संसार
झेल्यां हां म्हे प्रळय रा बादळ
अर सह्यो है त्रासदियां रो गहरो दंश
पण नीं भूलां म्हे म्हारा प्रतिमान
खोजां दिव्य चेतना रो निरमळ पथ
अर गावां स्व-विभु रा गीत
नी सुहावै म्हानै रावण
अर नीं आंधो धृतराष्ट्र
नाचै म्हारै मन में तो सर्वहित भाव रा छंद
स्नेह रो बह्वै जठै झरनो
पुलकै जठै मन रो भगवान
प्रेम री बह्वै जठै सलिला
होय जावै बठै मन अमृत रो पुत्र
क्यों मानव वंशी आज दिग्भ्रन्त?
धरती नै बचाणी है तो लेवो संकळप
कै आ सृष्टि म्हारी
ओ विश्व म्हारो
अर ओ अस्तित्व म्हारो
रचां म्हे इणरा मंगल सूत्र...