सिल्पकार! चौसठ कळावां रा सिरजणहार।

थारी कळा रौ परगट रूप

थारै सधियोड़ा हाथां सूं घड़्योड़ी

किणी देव-मंदिर री पाखाण मूरत,

आकास-तणा राजमहल,

गढ़ किलां रा कोट-कांगरा,

जांगै किण दिन सूं गोळ चकरौ बणाय

जीवण नै गती दी।

थारी अै निरजीव सिरजणावां

थारै मरियां पछै छोड जावैला—

समै री सिल्ला माथै नांव री अमर यादगार।

पण थारै मन री पीड़

थारा वै कटियोड़ा दो हाथ

अंधारै में गारत व्हैती जिंदगाणी

जबान-हीणी वांणी-राज महलां रा इत्यास

लिखणाळा इत्यासकार

अर समाज री आंधी आंख्यां

नीं देख सकैला।

काळ रै गरभ में दब्योड़ी

जुगां सूं अबोली बांणी नै

सब्द रूप देवण सारू

जलमणौ पड़सी किणी कवि नै

थारी जसगाथा लिखण सारू

धरणा पड़सी केई'क रूप कविता नै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रामसिंह राठौड़ ‘डांवरा’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-31
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