बापू म्हारा!

थे आखी जिनगाणी

खेतां में

खोद्या ठूडया

बेच्या किणी नैं

अेक-दो रिपिया किलो

थे पण

तपती ईं बेकळू में

सींच्यो रगत-परसेव

गाळ्या हाड-चाम

फेरूं भी

कदैंई नीं थम्या

आप पण लड़या

ज्यूं लड़ै

मरुधर माटी

तावड़ै अर आंधियां सूं।

स्रोत
  • पोथी : राजस्थली लोक चेतना री राजस्थानी तिमाही ,
  • सिरजक : संदीप ‘निर्भय’ ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी साहित्य-संस्कृति पीठ
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