तन-तन नै मुळकाती, दीप सजाती

मंगळ गाती, नव उजास पळकाती

हंसती आवै लिछमी लाडली

आसोज में आस बधाती, आधी काती उजाळी

अमावस री रात अजूणी, चम-चम करै नखराळी

पल-पल पलक बिछाती, सारी रजनी सोभा पाती

जग मग आवै लिछमी लाडली।

नुवां भंडार भरती तम-रज हरती

रमती-झमती, लुळ-लुळ मुजरा करती

धम-धम आवै लिछमी लाडली।

गज-मोतीड़ां रै थाळ सूं, तूठै नंद-किसोर

आंगण-आंगण रै उजास में, मुळकै मन मोर

फुलझड़ियां फरमाती पटाखा सूं घणी सरमाती

लपती आवै लिछमी लाडली।

हाळीड़ा हरसाती, राती-माती

रंग रचाती, मीठी मौज मनाती

घर-घर आवै लिछमी लाडली।

कामदेव री गोरड़ी, पुळ रा मोती बावै

आलीजै री औकूं मांय, जबरी जोत जळावै

लोभीड़ा नै भाती, नुवैं दीपां सूं तन-तपाती

बगती आवै लिछमी लाडली।

ठुमक-ठुमक मटकाती, मन मुळकाती

लाड-लडाती, लुळ-लुळ लचका खाती

रमती आवै लिछमी लाडली।

मिठाई ढेर-सी लुटाती, बाळकां नै खूब भाती

तारां री बातां सुणाती, खिलती दियां री बाती

बुराई नै बुझाती, दुनिया बिड़दाती ललचाती

मुड़-मुड़ आवै लिछमी-लाडली।

तन-तन नै मुळकाती, दीप जलाती

मंगळ गाती, नव उजास पळकाती

हंसती आवै लिछमी लाडली।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सत्यनारायण शर्मा इन्दोरिया ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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