आज हिमाळै रै माथै पर

अेक इसो दीवौ सिलगाणौ।

जन-जन रौ मन मैल तम हरै

इसी क्रांति रौ दीप जगाणौ।

भाई-भाई मरै देस में

मिनख मर रह्या है दंगा में।

आज धरम री आड मांड नै

जैर घुळ रह्यो है गंगा में।

जको मानता सै आत्मा

अेक रूप, भाई भाई है।

अेक ओज है, अेक तेज है

अेक जोत सिलगाई है।

वै स्वारथ रै हाथां आज

कठपूतली बणनै नाचै नागा।

दुस्मण रै हाथां में खेलै

भाई सू भिड़ रेवै आगा।

जात-पांत नै चोखो मानै

जाति रो अेको चावै है।

पण सै धरमां रै अेकै सूं

कतरावै है, घबरावै है।

जद जात-पांत रो जहर

नसां में मिनखां रै घूळ जावैला।

तो भारत री अेकता बतावो

कठै कियां रै पावैला?

अै मात-भोम रो मुकुट

स्वार्थ रै हाथां नाच लुटावै है।

अै कर्म-भोम में इसा इसा

नित रोज कुकर्म रचावै है।

पण भारत री जनता है

मरम धरम रो समझै है।

भोळी भाळी किती होवो

छळ-छद्म करम रो समझै है।

इण गीता रा उपदेस सुण्या

इण सुणी बुद्ध री वाणी नै।

इण वर्धमान रो ग्यान गुण्यो

गुरु-ग्रन्थ सुण्या है जाणी नै।

इण ईस रा उपदेस सुण्या

बांच्या उपदेस कुराणां रा।

गांधी वाणी सूं न्हाई

गाया है स्लोक पुराणा रा।

जाणै है, कुण दुस्मण है

पण नाम दोस्ती रो लेवै।

कुण काळा कर-कर नै कूटै

नै कुण निजरो स्वारथ सेवै।

जागरुक म्हारी मायड़ है

मीठो है सै नवो-पुराणौ।

जन-जन रो मन मैल तम हरै

अेक ईसो दीवो सिलगाणौ।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : नैन मल जैन ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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