कुण जाणै कद चढ़ी ताप कुण जाणै कणा उतरगी।

म्हारी ही लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥

कितरी बांण कुबांण लियां

जीर्‌यां हां नकटा होके।

झूठो सुख आंटी में बांध्यो

गांठी को सो’खो कै।

कोई राजी बोल दियो तो समझो नीत फिंगरगी।

म्हारी ही लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥

जणो-जणो संगी होतो

पण जणै-जणै सूं खो ली।

कूणै खड़ी कुबांण देख कै

सागै-सागै हो ली।

थोथी सार, संभाळ, स्यान चौरस्तै बीच पसरगी।

म्हारी ही लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥

नित री देर करी जागण में

आळस नै घर नूंत्यो।

सौ जलमां रो जाप जमारो

कितरो सस्तो कूंत्यो।

सूत्या रैया, गांव री गायां खेत समूळो चरगी।

म्हारी ही लापरवाही म्हानै तो ठंडा करगी॥

आ' छा तो ही ढुळणै जोगी

ढुळगी, काम निपटग्यो।

अब मैं जोऊं बाट, भाग री

कुण अै सांकळ जड़ग्यो।

ज्यूं धोबी रो गधो घाट पर बाट उडीकै घर की।

म्हारी ही लारवाही म्हांनै तो ठंडा करगी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भागीरथ सिंह ‘भाग्य’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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