घर रै मांय बूढ़ी मां रो

अतो दबदबो कै

उण रै हुकम बिना

हाल नी सकै घर रै मांय पत्तो

जे हिला देवै कोई नाड़

मां रै सामै घर में

तो खतम कर देवै मां

सगळा अधिकार

अेक मिनट में

म्हारा बापू जाणै

इण सगळी गत नै

अर रैवै मून सह्यां

घर रै मांय

सांच कैवण री मनाई

अेक दिन म्हारा ताऊ सोची

मां सूं कीं लेवां अधिकार

अर घर रो चलावां काम

लेवो झुणझुण्यो

अर पोतै रै पालणै कनै बैठो

पोतो रोवै तो झुणझुण्यो बजावो

गोळी-गुटकै सूं

ईं रो मन बैलावो

अर चावो तो

खुद रै मुंडै रो सुवाद भी

बदळो आं गोळ्यां सूं

ताऊ समझग्या

उणां री औकात है

बै चुपचाप झुणझुण्यो बजाबा लाग्या

बिंया ताऊ क्यूं

घर रा सगळा

जिम्मेदार मिनख

मां रै हुकम पर

बस बजावै झुणझुण्यो

अर मूंह रो सुवाद

बदळबा सारू

खावता रैवै टॉफी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कृष्णबिहारी सहल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 12
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