आपां हुयग्या सतवादी हरीश्चन्दर

पण

सांच कदैई नीं बोलां

जे सांच अचाचूक

जीभ माथै भी जावै,

तो आपां

खारी गोळ्यां री तरियां गिट जावां

सेवट क्यूं

बतावूं आपां पूंजी अर मानखै री

दोगली जूण हां।

उणियारै माथै उणियारां

उणियारै माथै उणियारां

उणियारै माथै उणियारां

प्याज रै छिलकां भांत उतारता जावौ

सेवट वजूद जेड़ौ

अेक दाणों

पिंछाण भी रामनाम सत

लारै खाली मिंडी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
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