थारै आवण री खबर

पूगी ही म्हारै तांई

तूं ही समाचार कराया हा नी?

हां..भाया

थारो रंग-रासौ

इसो के देख-दुखार हो

म्हनै लाग्यो हो–

तू आवैला।

पण कोनी आयो

छेकड़ क्यूं?

बावड़ग्या सगळा बादळ

अठीनै आ’र

इन्द्र

भलाईं काण राखूं

थारै बादळां नै

लाडी, अठै तो रोज

बरसै है–

रेत!!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : नीरज दइया ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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