बसंत सी

आस

चारूं कूंट

मुरधर मांय

हबोळा खावै ही।

पण

बसंत कणां आयौ

अर

कणां गयौ

कोई नै ठा नीं पड़ी।

कोई रूंख माथै

पानड़ा नीं आया

नीं कोई फूल लाग्यो

नी कोई फळ।

सुक्योड़ी सै तमाखी

अर भंवरा नीं उड्या

खाली खंख उडी

अर

मदन मईनै मांय

मदन पटवारी आयौ

जकौ कैग्यौ

करजौ पूठौ करणौ है!

पण

गांव मांय

अेक री बी जुबान स्यूं

नीं फूट्यौ

करजौ तो म्हारौ बी बाकी है

विधना खानी

जे दे सकै

तो देवै देखाण

म्हारा लारला पांच बसंत।

पण कुण पूछै

कै’नै पूछै?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : ओम पुरोहित कागद ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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