काक रै किनारै म्हारौ गांव रे

हरियै-हरियै रूंखां वाळौ

मीठै-मीठै मोरां वाळौ म्हारौ गांव रे

धवळा-धवळा ऊंचा धोरा

ज्यांरै आगै छाया ओरा

जाळ, वण नै खेजड़ी रै, नीचै म्हारी झूंपड़ी'र

रामैयौ रमै रे म्हारौ, हिवड़ौ खिलै रे म्हारौ

गैरी-गैरी छांव रे

काक रै किनारै म्हारौ गांव रे

असाढ महीनौ आयौ

मेघ-मल्हार गायौ

रिमझिम-रिमझिम मेहूड़ा बरसै

हिवड़ौ रे हरखै, टुलै-टुलै पीचा बोलै

पिंयाव पिंयाव रे

काक रै किनारै म्हारौ गांव रे

गोडावण मगरै आयौ

सांवणियौ फूलां छायौ

पल-पल वीजळ पळकै, आवै ठंडी वाव रे

मेटै तप-ताव रे

काक रै किनारै म्हारौ गांव रे

सांझ री रूपाळी बेळा

पंखी नै पंखेरू भेळा

रूंखड़ां री टूकां बैठा, बोलै मीठा बोल रे

गायां रे रंभावै, भावै दूधड़ दुहावै

गोखा भरिया ठांव रे

काक रै किनारै म्हारौ गांव रे

भादरवौ महीनो आयौ

गोरड़ियां गीत उगायौ

तीजणियां झूला झूलै, मनड़ै री माटी फूलै

छम-छम छम-छम छम-छम बाजै

मैंदी वाळा पांव रे

काक रै किनारै म्हारौ गांव रे

आसू महीनौ आयौ

खेतां में धान सवायौ

काटै रे हिळमिळ करसा, बाजरियां रा बूंट रे

झोळ्यां रे भर-भर लावै, झूम-झूम नाचै गावै

भायां जैड़ा भाय रे

काक रै किनारै म्हारौ गांव रे

आवो-आवो भायां आवो

उजड़्या खेड़ा फेर बसावो

खेतां में धान उगावो, दुनिया री भूख मिटावो

करलो मजूरी, देस री हजूरी भायां

करलो अपणौ नांव रे

काक रै किनारै म्हारौ गांव रे...

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थांनी मासिक) ,
  • सिरजक : नन्दकिशोर शर्मा ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : जून 1983
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