थांरी प्रीत!

म्हारै ऊजड़तै संसार रै

थाग लगायनै

बचावतौ राख्यौI

थांरी प्रीत!

म्हारै टूटतै मन नै

हेत सूंप

जीवतौ राख्यौI

थांरी प्रीत!

म्हनै म्हैं हुवणौ

सिखायनै,

फेरूं ऊभौ कर्‌यौI

थारी प्रीत तो है…

जिकी रै पांण

आज म्हैं मांडूं

जीवण-जुद्ध री ओळियां!

स्रोत
  • सिरजक : दुलाराम सहारण ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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