कितरी पीड़ पराई ओढै

कितरी पाळै मांय

जगत सूं रीस बावळौ

मिनख आपरी गत नै भोगै,

साच-कूड़ री

कितरी बातां जीवै है

अर बिसरावै

अपणायत री ओळ आपरी।

धुखै मांय रौ मांय अणूंतौ

पण नीं जाणै

काया नीं सदा रैवणी,

इणरी गत नै

जाणै है पण रीस बावळी

बाथ पकड़ नै ले जावै

अंतस री उण धंधार मांय नै

जठै मिनख नीं रैय सकै

मिनखपणै रौ रूप धार नै।

परबसता री सगळी पांती

राखै खुद रै खातर

सूंवै मारगां चालणियां नै

यूं कर देखै

ज्यूं आवै अणजाण जातरू

मारग भटक्या,

जीणै री जुगती कैड़ी

बगत बावळौ

के थूं अर म्हैं हुया बावळा?

काठी पकड़ै वा कूड़ी करडाण

जिका चित्त सूं

गांठां में बंध लागण लागै

साच सरीखी,

मन रै इण अंधारा नै

मेटण रै खातर

कुण खोलै वै गांठा

बंधगी जिणमें

थारी-म्हारी मिनखपणै री दीठ।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सत्यदेव संवितेन्द्र ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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