म्हे गुमनाम रचनाकार हां

थे म्हांरो जिकर करोला

खुद रै किणी पानै माथै, म्हांरौ नांव लिखोला?

कांदौ अर रोटी सूंघ’र म्हां इण खेत नै

जोतता रैया।

अर जिंदगाणी रै नांव माथै फटकार देता रैया

खैर मनावौ के म्हां थांनै केई खबरां देवता रैया

थांनै इणरी तिरस ही, म्हां खुद रौ रगत बैवावता रैया

आवणिया कवियां री कलम विकास रा गीत लिखैला

पण

यातनावां री लंबी कथा अणलिखी रैय जावैला

म्हांरी जिंदगाणी रौ कीं अरथ नीं है कांई?

अेक जै’र री खारास है—बस

और्‌यूं म्हांनै कीं नीं कैवणौ

कांटां री अेक बाड़ ही, जिणरी छींयां झूलती रैयी

अर म्हांरी मा

म्हांनै जलम देय’र पीड़ में घुळती रैयी

पतझड़ में म्हां माखियां ज्यूं मरग्या

मायड़ियां रै विलाप नै फगत जंगळी पत्ता इज सुण सक्या

जिकौ बाकी बचग्यौ

वौ पसेवै सूं रगदाबगद हौ

म्हांनै बळदां ज्यूं जोत लियौ गयौ

बडा लोग बोल्या—“औ इज अरथावू जीवण है।”

पण म्हांरौ दोस इज है

के म्हां इण दरसण माथै थूक दियौ

इण दुख री पीड़ री कीमत म्हां नीं मांगां

म्हांनै बदळै में

किणी मुआवजै, प्रसिद्धि री जरूत कोनीं

नीं म्हां कैलेण्डर री तस्वीर बणणी चावां

बस

जिका म्हांरै पछै आवै वांनै इत्तौ इज कैईजौ—

अेक जिंदगाणी, अेक कल्पना, अेक मूरत म्हां घड़ता रैया

अर उजास खातर अंधारै सूं लड़ता रैया।

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : निकोला वाप्सारोव ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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