अचाणचक

भाठो

चीख्यो

चालतो हाथ

रुक्यो,

बोल्यो— मिनख।

थारै हाथां नै रोक ले

छिणी हथौड़ी फेंक दे।

मिनख कैयो— गैलसफा!

बात सुण।

गैराई सूं गुण—

हूं थनै घणो रूपाळो

रचा सूं

अरै जगत सूं पुजवासूं।

भाठो चिरळायो-

नहीं-नहीं

मनैं तरास मती

मनैं संस्कार मती

भाठै नै भगवान बणावणो

थारी फितरत है,

अर

धर्म आन्धो हुवणो

मिनख री आदत है,

म्हैं म्हारै नामै

मिनख नै राखस

बणावणो नीं चावूं

रगत बैवावणो

नीं चावूं

घर नगर बळावणा

नी चावूं

म्हां पर मिनख पणो

मत चढ़ा

म्हां सूं मूरत

मत रचा

मनैं यूंही

ठोकरां खावण दे

मनै भगवान नहीं

भाठो रैवण दे।

भाठो रैवण दे।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : लक्ष्मीनारायण रंगा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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