धू-धू कर धरती बळै, धूड़ बणी अंगार।
जाण नवोढ़ा केलड़ी, आंगण रखी उतार॥
भाग फाटियां धक-धकै, आभै सूरज लाल।
जाण दड़ी हंकरात री, टाबर फेंकी बाळ॥
फागण रै चसकै लग्यो, सूरज खेलै फाग।
दोपैरी रो तावड़ो, किरणां बरसै आग॥
ठंडौ मुधरो बायरो, बदळी अपणी चाल।
चालै रूंख उपाड़तो, अवर बाळतौ खाल॥
लैरां लेता जे कदै, नदी-सरवरां ताल।
रस कस जौबन चूसियो, उन्हाळा रै काळ॥
वन रा हरिया रूंखड़ा, बळ-बळ बणिता ठूंठ।
जाण रमायी राखड़ी, दुनिया दारी रूठ॥
नान्ही मगरी सोहती, हर्यै कसूमल वेस।
धोळो फट मुखड़ो हुयो, जाणै पिउ परदेस॥
तड़फ-तड़फ पाणी बिना, पसुवां छोडी सांस।
भूख मिटाई चींचड़ां, कियां बुझावै प्यास॥
माळा पंछी बावड्यां, बिन चुग्गा लू आंच
मायड़ हिय टुक-टुक हुयो, चूजां खोली चांच॥
भरियै जोबन गोरड़ी, कीकर राखै गाढ़।
बिरह जळै, लूवां बळै, दुबळा दोय आसाढ़॥
विरह अमूझी कामणी, लूवां लेवै अंत।
सूख’र होयगी कामड़ी, भली करी थां कंत॥
रातां लगै न आंखड़ी, करवट बदळै सेज।
भाग फट्यां पैली भगैं, लियां नवोढ़ा नेज॥
पींदै जळ वैसाख में, पणघट आधी डोल।
जेठ चितारै कामणी, पाणी घी रै मोल॥