मुसळां रा घमीड़ बाजता, हांडी बगत अर सिंझ्या रा

बाजरियै रो मीठो खीचड़ो, बींरी खुरचण गई कठै?

धैन धपाऊ धीणो धापो, बै’ता नाळा दूध-दही

तारा ऊगै मंडतो बिलौणो, बींरी थरकण गई कठै?

बाजू बल रा देख तमासा, चाकी मंडती अध राती

नित पीस पोंवती रोटी, बे नारी 'नर' गई कठै?

सावण सुरंगो, मास भादरवो, मेळा-ठेळा उच्छब घणा

हींड, हथाई गोठ गफ्फा, पर जोहड़ वाली पाळ कठै!

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुनियोड़ी ,
  • सिरजक : मघाराम लिम्बा
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