मिनखपण नैं भुलायो क्यूं?

जगत में नांव लजायो क्यूं?

दगो कर दोगली बातां

दीठ दुसमण री घूरी ही

हिमाळै में के थारै बापरी

हेमाणी बूरी ही?

सींव नैं सूनी क्यूं समझी

भाई बण बोलियो धाड़ो

निहत्था मार मिनखां नै

लोही री तिसणा पूरी ही

हिमाळै में के थारै बापरी

हेमाणी बूरी ही?

समर सूं पग किंयां मुड़ग्या

रे कायर, पीठ क्यूं फोरी

समझगी आखली जगती

रे थोथी नर-गरूरी ही

हिमाळै में के थारी बापरी

हेमाणी बूरी ही?

अठै घर-घर में अणुबम हा

रे आगनीबाण हा तीखा

सुदरसण-चक्र ना बायो

मिनखपण री मजबूरी ही

हिमाळै में के थारै बापरी

हेमाणी बूरी ही?

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : भीम पांडिया ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : नवम्बर
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