कोचरां री सैंस आंख्यां स्यूं

बाट जोवती सोचै है

ऊंची-ऊंची हेल्यां

कै कोई तो होतो

जका सुणा पाती म्है

म्हारा टीबा-सा मन में उठती

बाळू रेत-सी पछाड़ा खाती

भावनावां री आंधी रो मरम।

भूल गया सैंका सैं

मायड़ री करळाती कूंख

आभै ऊंचो चढ्यो निसाण

मातभोम रो करज

अर बेरो कठै है उण नै

कै थांरी हेल्यां में

थांरा बड़कां री आतमां

तरसै है

मिनख री सूरत देखणै खातर।

अब कै बताऊं चिमगादड़ां नै

अर कीयां समझाऊं

कै चिपकाणो चाऊं हूं अेक बार

हूक उठती छाती सूं

प्रवासी-बिसूरता पूतां नै।

देखणो चाऊं हूं म्हैं

आंगणै में धमा-चौकड़ी

बीनण्यां रा छमछमाता बिछिया

गोखां पै गुड़गुड़ातो हुक्को

सदाबरत बंटतो मांवस पून्यूं

बस! अेक ही साध है मन में

कै सौ बरस पूरा होणै स्यूं पैली

ओज्यूं चाऊं हूं देखणो

चूला पै तपतो

तूवै रो हांसणो।

जे कोई जा’तो-सुणतो हुवै

कलकत्तै-मुम्बई

तो हेल्यां री ओळ्यूं

अर

घणी-घणी राम-राम

जरूर-जरूर कहीजे।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राधेश्याम अटल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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