हे परभू!

इयै मानखै रो कियां

बिगड़ग्यो खाको

बिना सोचै-समझै

करतो रैवै धमाको

कांई इयांरो जमीर

हुयग्यो लीर-लीर?

भर देवै मा-बैन री आंख्यां में लोई री लकीर

इयां कियां निसर जावै

इयांरो राम

धाप नीं आवै

करता रैवै खोटा काम।

स्रोत
  • पोथी : हूं क तूं राजस्थानी कवितावां ,
  • सिरजक : नगेन्द्र नारायण किराडू ,
  • प्रकाशक : गायत्री प्रकाशन
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