घाणी बची तांत अब, रहट रह्या बैल।

लाव चड़स नीं ढेकळी, खुद्‌या ट्यूब का वैल॥

झाड़-फूंक अर टोटका, गारड़ियां की रीत।

फीका धूणी देवरा, भोपी को संगीत॥

करै खराबो खोड़ला, खोटा खेलै खेल।

चूसै खून गरीब को, बणकर अम्मर बेल॥

पून झळै च्यानण करै, बीजळ हाळो खेल।

तातो सीळो करै, बिन सिगड़ी बिन तेल॥

उड़न खटोलो भूलगा, आभै उडर्‌या जेट।

मुट्ठी में संसार है, घर-घर इंटरनेट॥

तन को सुख तो सौ गुणूं, गयो मनां को चैन।

ऊपर को निरमाण है, भीतर लंका धैन॥

पुरखा नागा रैवता, बिन साधन बिन ज्ञान।

पण इब तो फैसन बणै, नागापण में श्यान॥

भोज, भजन अर प्यार सब, छिपकर करता भोग।

इब चौड़ै में चूमकर, श्यान बढ़ावै लोग॥

बढर्‌या हां या लौटर्‌या, होगी घोळ-मथोळ।

चौड़ै आया ठा पड़ै, छिपी ढोल की पोल॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : महावीर जोशी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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