लटक्या रंग बिरंगा अै फंदा।

पणप्या चोरी-जारी रा धंधा।

तेरी-मेरी में उळझ्या बंदा।

छतरी कळजुग ताणी है॥

दादा-दादी छूमंतर होया।

सुपना नाना-नानी रा सोया।

हाथ नै हाथ अब खावै देखो।

ईंट-ईंट अब भैया बाटै देखो।

कपटी चूटियो चाटै देखो।

गंदो गंगाजी रो पाणी है॥

नाग फूंकारै मुस्काणां में भी।

जहर भर्‌यो आं गाणां में भी।

लपट लूवां री बहारां में भी।

गरजै नसै-पतै री राणी है॥

काळी माया अर काळी रातां।

समधी भी करता भीतर घातां।

बळै बहुवां अठै मौत रा खाता।

मिटगी प्रीत रीत निसाणी है॥

कांपै अै बूढी भींता कित्ती।

अेक म्यान में कटारां कित्ती।

बगै नदियां लहू री कित्ती।

हठ कोंख मिटाणै री ठाणी है॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मुखराम माकड ‘माहिर’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-34
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