बरत बड़कुलीया राखती

धान पीसती

पोटा थापती

गांव री लुगायां!

गाळ्यां, अबखायां

अर मौसा सैंवती

काळा आखर

भैंस दांई जाणती

गांव री लुगायां!

पगड़ी-टोपी देखती

घर आंवता लुक जांवती

मूं सीम्यां रैंवती

चूड़यां पै’रती-

गांव री लुगायां!

पास-पड़ोस जांवती

आपस मांय

लड़ांवती

करती गिंगरत कै करती राड़

गांव री लुगायां!

टाबरां नैं खिलावती

छोर्यां रा पट्टा बावती

कै सांसुवां बिसरांवती

गांव री लुगायां!

स्रोत
  • पोथी : राजस्थली पत्रिका ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : श्याम महर्षि
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