नैणां घुळगी नींद

नींद में रुळगी सारी रात

रात नै समझी म्हैं इक बात

कुवै पड़गी भांग के रांडी रोवणौ

दुनिया रौ दस्तूर, धोय निचोवणौ

करसौ गयो सेठ री हाट

हाट में पड़िया खोटा बाट

बाट सूं धान तुलायौ जाट

खोटै वाटां सूं भी नमतौ तोलणौ

कुवै पड़गी भांग के रांडी रोवणौ

बैंक सूं करै बापड़ौ अरज

अरज में मांगै रुपिया करज

करज भी दस बिन हुवै दरज

सबसीडी खावणियौ सोवणौ

कुवै पड़गी भांग के रांडी रोवणौ

अदालत थोथी थळियां है

फीस री गेहरी गळियां है

वकीलां मीठी डळियां है

डूंगरियौ छेटी सूं लागै मोवणौ

कुवै पड़गी भांग के रांडी रोवणौ

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : कैलाशदान देवल ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : अगस्त 1987
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