रात घणी देर तांईं

वै म्हारै सागै हा

वै चारूं–

धर्माचार्य, वोपारी,

विदूसक अर अध्यापक

कद काठी में म्हारै सूं

इतरा ऊंचा, इतरा भारी

कै उण चारूं सामी म्हैं

अेक रमतियो लागतो।

उण में सूं हरेक री

जबर चिन्ता आ’ कै

मैं भीड़ में कठैई

गुम नीं जाऊं

वै बारी-बारी सूं

आपरी आंगळी थमा

देंवता म्हनै

जिण री आंगळी

म्हारी मुठ्ठी में व्हैती

वो म्हनै आपरी

निजी सम्पति समझण लागतो

उण वेळा

चालतां-चालतां

म्हे सै जणां

अेक सून्याड़पण

खुली जागां में आयगा

म्हैं छुड़ा ली आपरी

आंगळी अेक झटकै सूं

अर चालणो सरू कर दियो

खुद री मन मरजी।

इण झटकै सूं

वै चारूं सावचेत व्हिया, सला कीधी अर

अेकासागै कूकण लागा–

‘करो, जो थारी मरजी

व्है करो,

थानै ठा नीं है सायद कै

बस्ती सूं बेसी खतरो

मिनख नै सून्याड़ जागां में

हुया करै है।

अठै थांरै गुमण रो भौ तो नीं है

पण थांरै कनै

जिकी पूंजी है

उणनै कोई चोर

उच्चको लूट सकै है।’

म्है कह्यो–

‘म्हारै कनै कीं है?

जिणनै कोई लूट सी

सिवा गिणती रा सबदां रै।’

बै ठठा’र हांस्या– ‘वै भी कठै है बावळा

म्हे तो हां वै

सबद जो थारी जेब में

खणकता रैवता हा

सिक्कां री तरै।’

म्हैं जेब टंटोळ’र

देख्यो–

बठै सूं चारूं सबद गायब हा

अर म्हारै सामीं

वै चारूं जणा भी

अलोप व्है गया हा।

अब म्हैं हो अर सून्याड़

अबूझ मारग हो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भगवतीलाल व्यास ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 12
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