म्हैं लिखणो चावूं

अेक सावणिया गीत

पण हाथ में नीं आवै भासा।

हुळस आंख्यां कर जावै जळजळी।

सदा हियो रैवै ऊकळतो।

म्हारी कविता री बळधागाडी

पज जावै कादै-कीचड़ में।

च्यारूंमेर कवि लिखै छै

कवितावां अर गीत।

झरै छै वांरी कवितावां

सावणी झड़ियां रा गीत।

न्हावै छै जिणमें रूपसियां।

अपसरावां रै लोकां सूं ऊतरी

ऊजळी कायावां रा पळका पाड़ती।

म्हारै च्यारूंमेर क्यूं ऊतरियोड़ी अमावस।

म्हारी लुगाइयां री काया काळी सांवळी

विराईज्योड़ी दीखै वांरी आंगळियां।

अचाणचक आभै में लपटां उठै अगन री।

म्हारै कनली गरीबां री बस्ती बळै छै

धूआंधोर पसरगी छै च्यारूंमेर

लपटां अगन री आभै नै

गिटण ऊंची लपरका करै।

अगन बतावै म्हनैं कादै-कीचड़ में

पज्योड़ी बळधागाडी

जळजळी सांवळी कायावां।

म्हैं ऊभो देखूं सरापियोड़ी जूण

सावण झरै म्हारी आंखड़ियां।

लपरका करती लाय सूं

कींकर रचीजै सावणिया गीत?

म्हारी कविता री भासा व्हैगी छै जळजळी।

पण अेक दूजो कवि ऊभो छै अेका अेकलो।

वो नीं जोवै कविता सारू कोई भासा

कोई गीत।

वो बंतळ करै अळगै रेगिस्तान में

तिड़कती खेत री माटी

तपतै तावड़ै ऊभै आदमी सूं।

आदमी री आंख्यां में छै अकास।

भरोसो छै उणनैं कै जद तांई

पांगरै छै रेगिस्तान में फोग

मिमझर देती रैवैला खेजड़ी

बच्योड़ी रैवैला सेवण री जड़ां

सावण जरूर ऊतरैला उणरै सबद।

जरूर नाचैला धोरै माथै मोर।

कठैई कठैई

जरूर जोड़ै सागै डग भरती बैवती व्हैला गोडावण।

तद तो सावणिया-भासाई

अठैई-अठैई रमती व्हैला धोरै री ढाळ।

झरती व्हैला रातां रावड़ियां सागै

हेत रम्मतां

म्हारी अमावस रै अकास

चिलकण लागा छै आगिया।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत अगस्त-सितंबर ,
  • सिरजक : आईदानसिंह भाटी ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृत अकादमी, बीकानेर
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