हिवड़ै में सोच गौरी

जै अुणसूं मैं मिल पाती

कळी-कळी मन री खिलती

जलम-जलम रो सुख पाती

प्रीत-मिलण री वेळा में

मैं सरमाती-सी रैगी

होठ हिलाया बोलण नै

पण जाणै क्यूं चुप रैगी

कांई रीत प्रीत री है!

इण बातां सूं अळगी

लोक-लाज मरजादा रै

बंधण में काठी झलगी

साजन, थां सूं मिलणै री

हिवड़ै में तिरस जगी

तिरस्यो मन कद धापैला,

अुण दिन री है आस जगी

सावण री सी झड़ी लगी

म्रिगनैणी री आंख्यां सूं

घायल पंछी घबरावै

अुड्यो जावै पांख्या सूं

सगळो गरब गुमान मिट्यो

पथराई-सी आंखड़ली

अब तो साजन आय मिलो

गिणी-मिणी है सांसड़ली।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : धनञ्जय वर्मा ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : जून
जुड़्योड़ा विसै