हम्मीरदेव री देवळदे, सुन्दर-सी राजकुमारी ही।

मायड़ री आंख्यां री ज्योती, बाबुल री राजदुलारी ही॥

हो चंदा सो सीतळ चै’रौ, अर चंचल हिरणी-सी चितवन।

कुल जीवण रा चौदह बसंत, तद पार कर्‌यो हो जोबन-धन॥

इक दिन संझ्या की बागां स्यूं, बा घूम घरां नै आ’री ही।

पटराणी रंगादे बैठी, हम्मीर संग बतळा’री ही॥

चिरचा बातां में खुद री सुण, देवळदे कान लगा बैठी।

चुपकै-चुपकै सगळी बातां, सुणणै में ध्यान लगा बैठी॥

तद रणतभंवर गढ़ रै ऊपर, रण रा बादळ मंडरार्‌या हा।

सुल्तान-अे-दिल्ली खिलजी स्यूं, गढ़ रा जोधा टकरार्‌या हा॥

हम्मीर कह रयो हो- म्हे कल, म्हाराणी रण करणै तांईं।

जावांगा सगला सज-धज की, बाना केसरिया रै मांई॥

जे विजयश्री नीं मिल पाई, लड़ता-लड़ता मर ज्यावांगा।

पण पीठ दिखा रण रै मांई, केसरिया नहीं लजावांगा॥

मन्नैं मरणै रो दुख नीं है, कंवरी री चिंत्या सालै है।

सोंवतां-जागतां मन्नैं दुख, ही बस फोड़ा घालै है॥

हालत में तो सुण बींरा, पीळा भी हाथ होय सकै।

क्वांरी कन्यां है तांई, जौहर री सेज सोय सकै॥

जे बीं नै मारूं मैं कुळ रो, रण-धरम निभावण रै तांईं।

हिम्मत नीं होवैगी मेरी, तलवार उठावण रै तांईं॥

तलवार उठा भी ल्यूंगो तो, तलवार चला नीं पाऊंगो।

अटल सच्च है म्हाराणी, मैं बेटी मार पाऊंगो॥

यूं कैहकर वीर अधीर हुयो, आंखड़ल्यां पाणी छळक्यायो।

बज्जर री छाती हुई मोम, दुखड़ै स्यूं हिवड़ो पिघळ्यायो।

देख दसा निज बाबुल री, देवळदे जरा अधीर हुई।

बेटी रो धन भी के धन है, सोच जरा मन पीड़ हुई॥

क्यूं जग में हर कोई नै ई, बेटी री चिंत्या खा’री है।

क्यूं बेटां स्यूं बेटी धन री, कीमत कम आंकी जा’री है॥

ले जळम अेक ही कूख मांय, इक गोद मांय कर उछळ-कूद।

दोनूं पळै बड़ा होवै, इक मायड़ली रो पीय दूध॥

फैरूं बेट्यां रै ऊपर ई, जग री मरजाद तणी क्यूं है?

उचित-अनुचित री बहुत घणी, सब सीमा रेख बणी क्यूं है?

मोको मिलियां हर छेत्र मांय, मरदां पर नारी भारी है।

पण ‘पच्छपात-लिंगीय नीति’ नारी धन री लाचारी है॥

रोग मेटणो ही पड़सी, यूं सोच निजर झट दौड़ाई।

सामनै टंग्योड़ी खूंटी पर, नंगी तलवार निजर आई॥

मन ही मन हरखी देवळदे, सुमरण कर मात भवानी नै।

चूमी तलवार उठा कर में, देती-सी मोड़ कहाणी नै॥

फेरूं पूगी बण रणचंडी, हम्मीरदेव रै सामी बा।

फींक्यो खांडो धरणी पर अर, गरजी बाबुल! चाल उठा॥

अर, होय बेधड़क झट मेरै, ईं धड़ स्यूं सीस अलग कर दे।

बलिदान माँग’री है माटी, माटी री मांग रगद भर दे॥

या अेक बार दे छूट मनैं, अब तलवार उठाणै री।

ईं गढ़ री नारी सगती नै, निज रण-कोसळ दिखलाणै री॥

ईं वीर धरा री हर बाला, है रण करणै में निपुण घणी।

आनै आज्ञा रण करणै री, दे-दे तूं रणथम्भौर धणी॥

तो मात भवानी री सोगंद, दुस्मण नै धूळ चटाद्‌यां म्हे।

अर जुद्ध मांय तलवार चला, जौहर अपणो दिखालद्‌यां म्हे॥

बेटी रा वीर वचन सुणकर, हीयो बाबुल रो दरक्यायो।

है असल सेरणी री जाई, जाण घणो मन हरख्यायो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : ताऊ शेखावाटी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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