मरूधर रौ

अकूत खजाणो

किचर, टींडसी

मीठा बोर।

कैर-सांगरी

फोग, खिंपौळी

अर

मतीरां

मिलै कोनी

दूजी ठौड़॥

स्रोत
  • सिरजक : घनश्याम नाथ कच्छावा ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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