अेक दिन अेक भिखारी मिल्यो

मनै देखतां ही मुरझागो, बिल्कुल नहीं खिल्यो

वो मनै ‘बाबूजी कह’र भीख मांगी

तो मैं धिक्कारतो सो गाळी दागी—

'सड़क चालता लोगां नै ठगर्‌यो है

हट्टो-कट्टो है भिखारी भी नहीं लागर्‌यो हैं'

भिखारी बोल्यो— 'जाणूं हूं तू डरप’र भागर्‌यो है

मैं भिखारी नहीं तो तू ही कुण सो ‘बाबूजी’ लागर्‌यो है

मेरो मूड खराब मत कर

सिर्फ पांच पीसा दे मर'

मैं बोल्यो— 'इतरी देर सूं बेकार ही बांगर्‌यो है

अर भीख में भी सिर्फ पांच पैसा ‘ही मांगर्‌यो है'

भिखारी कही— 'श्रीमान् पीसां खातर नहीं मरूं हूं

मैं तो आदमी को स्टैण्डर्ड देख’र बात करूं हूं'

मैं मन ही मन सरमायो

अर फरमायो—

'दोस्त खुल्ला नहीं है'

वो बोल्यो— 'सही है

कितरा का खुल्ला चाहे, निसंकोच कैदे

मैं देदे स्यूं चाहे सौ को नोट दे दे'

मैं स्थिति संभाळी

अर बात टाळी—

'भाई माफ करजे कवि हूं जेब साफ है'

वो बोल्यो— 'पैली ही बता देतो स्टाफ है

मेरी मान भगवान को नाम ले

कविता छोड़ अर कटोरो थाम ले

बियां भी वितमंत्री की नितियां में इतरो बळ है

कि अब ईं देश को भविष्य भीख में ही उज्जवल है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सम्पत सरल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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