मैं देख्या सेर कंपाते जूंहरा, खौफ भरी दहाड़ो हूं।
मैं देख्या सेर कोंपते जूंहरों, झड़ो तणी बहारों हूं॥
मैं देख्या खोंडा धार घणा, लोहे री सोंकळ ब़ाढणिया।
मैं देख्या खोंडा धार गया, मेणों नो छूते भागणिया॥
मैं देख्या झोंका औंधी रा, दरखत नो जगा छुड़ावणिया।
मैं देख्या झोंका औंधी रा, जो रया नी पता उड़ावणिया॥
मैं देखी लहरों सोर तणी, दुनिया रो सोर दबाती नों।
मैं देखी लहरों सोर गई, टिंटोळी रव गुम जाती नों॥
मैं देख्यो रूप कांमिणी चोखो, हर नर वस करणै वाळौं।
मैं देख्यो रूप कांमिणी चोखो, नगरी घाटों बिकणै आळौं॥
मैं देख्या बाज चिंकारमयी, कांठळ रै भी ऊपर उड़ता।
मैं देख्या बाज चिंकारगयी, पोंखे फैलाते ही गुड़ता॥
मैं देख्या सैंधव सूर गुढे, वायरियै बंतळ बावणिया।
मैं देख्या सैंधव सूर छडे, भेजै पाछा दळ लावणिया॥
मैं देखी घोर बरसाळै री, काळजियो उंडो बैठाती।
मैं देखी घोर बरसाळै री, घटियो रै हाकै गुम जाती॥
मैं देख्या सर तरकस भरिया, भाठो नो भी बींधण वाळा।
मैं देख्या सर तरकस भरिया, दरखत लंफो अटकण आळा॥
मैं देख्या पचरंग माथ पोतिया, हर घर सान कहण वाळा।
मैं देख्या पचरंग माथ पोतिया, तकीयो पूर बणण आळा॥
मैं देख्या वाद प्रवीण गुढ़े, सुरलोक सभा मन मोहणिया।
मैं देख्या वाद प्रवीण गुढ़े, रंगराग जगत रा खोस़णिया॥