नेकी

अर नेक चलण रौ

रह्यौ नीं आज जमानौ

इण वास्तै

नेक लोगां नै

आपरी नेकी रौ

पांवडै-पांवडै पड़ै है

नेग चुकाणौ।

काम कढावणै खातर

करौ मती नेग री नागा

मांगै जितरा बाळौ आगा

आपां नै आपरां रौ

जिंयां किंयां

काम काढणौ।

नेग,

नेग री बात नुंवादी कोनी

परापरी सूं

देता रहीज्या है अठै नेग

आपां रै बाप जमारै रौ तो

नुंवौ अविष्कार कोनीं

हां, इण में कीं फरफार

हुय सकै

पैली राजी-राजी देता नेग

अबै कदैक माडाणी लिरीज सकै

इत्तौ तो मानणौ पड़सी

नेगदार रै अड़ियां

नेग पार पड़सी

बिना मांग्यां आज पैलां

कुण-कुणसै नेग चुकाया?

भूल्यां नै अै लेवाळ बगतसर

नेग देवणा वादा दिराया...

नेग रौ जुग

थे भी नेग पंथ नै अपणावौ

सैकड़ूं देय करोड़ूं कमावौ!

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : विक्रमसिंह गून्दोज ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जुलाई 1987
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