ठंडी पवन म्हारो छुवै बदन

जीवड़ै में लागै अगन…

बीनै कुण समझावै

कठै स्यूं कुण आवै

बीनै कुण समझावै…

बढ़ती-बढ़ती बढ़गी बेलड़ी बाबल की

आती-आती ही गई रुत या सावण की

बेलड़ी फूलां आई

गळी में चर्चा छाई

मोरियो मन ललचावै-बीनै कुण समझावै।

छोटी होती-होती होगी ओढ़णिया तन की

छणं-छणं के आवण लागी बात म्हारै मन की

मावड़ी नींद उड़ाई

बापू पर करी चढ़ाई

बोली छोरी उफणती आवै, बीनै कुण समझावै।

पड़ती-पड़ती पड़ जासी बात या पुराणी

म्हारै बीना करसी कुण खेत की रूखाळी

म्हानै तो जायां सरसी

कोई नै आया सरसी

बीनै मनड़ो बुलावै-बीनै कुण समझावै।

ठण्डी पवन म्हारौ छुवै बदन

जीवड़ै में लागै अगन

बीनै कुण समझावै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बी.एल. सावन ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
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